बेसहारा व उपेक्षित महिलाओं की पीड़ा पर राष्ट्रपति कोविंद ने जताई चिंता

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद सोमवार को वृंदावन के कृष्णा कुटीर में आयोजित कार्यक्रम में निराश्रित महिलाओं से रुबरु हुए। उन्होंने कहा कि समाज के इतने बड़े और महत्वपूर्ण वर्ग को यूं ही उपेक्षित नहीं छोड़ा जा सकता। राष्ट्रपति ने विधवा जीवन को एक सामाजिक कुरीति करार देते हुए वृंदावन और ऐसे अन्य स्थानों पर रहने वाली बेसहारा और उपेक्षित महिलाओं की पीड़ा पर चिंता जताई। राष्ट्रपति ने कहा कि महिलाओं के पुनर्विवाह, आर्थिक स्वावलंबन, पारिवारिक संपत्ति में हिस्सेदारी और सामाजिक अधिकारों की रक्षा के उपाय किए जाएं और इन उपाध्यों के माध्यम से हमारी माताओं बहनों में स्वावलंबन-स्वाभिमान को बढ़ावा दिया जाए। राधे-राधे के अभिवादन से अपना संबोधन शुरु करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि वृंदावन को मैं राधा और कृष्ण के प्रेम का जीवंत उदाहरण मानता हूं। वृंदावन में मेरा अनेक बार आना हुआ है, लेकिन मेरे मन में बांकेबिहारी के दर्शन करने और आप माता-बहनों से मिलने की इच्छा थी। इसलिए आज फिर से जो वृंदावन में आने का सुसुअवसर मिला है, उसे मैं बांके बिहारी की विशेष कृपा मानता हूं। हम सब जानते हैं कि वृंदावन का अर्थ होता है कि तुलसी का वन। तुलसी स्वयं ही देवी का प्रतीक है। तुलसी का हर हिस्सा पवित्र और अर्पण करने योग्य होता है। वृंदावन के कण-कण में प्रेम और त्याग की कहानियां बसी हुई हैं। यहां राधा के दिव्य प्रेम को याद किया जाता है तो यशोदा के मातृ-प्रेम को सम्मान दिया जाता है, यहां गोपियों की प्रीति का उत्सव मनाते हैं तो मीरा बाई के समर्पण भाव का सम्मान करते हैं। यहां उपस्थित आप सभी माता-बहनों में यशोदा की ममता और मीराबाई के समर्पण कके दर्शन हो रहे हैं।

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